Sawan Somwar 2026:सावन का पवित्र महीना देवाधिदेव महादेव की आराधना के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। इस पावन अवसर पर शिव भक्त व्रत, जलाभिषेक और महामृत्युंजय मंत्र के जाप के साथ सोमवार व्रत की कथा का श्रवण करते हैं। पौराणिक मान्यता है कि जो भक्त निष्काम और सच्चे भाव से भगवान भोलेनाथ की शरण में जाता है, उसके जीवन के बड़े से बड़े संकट भी टल जाते हैं। आइए पढ़ते हैं भगवान शिव और उनके अनन्य भक्त बालक मार्कंडेय की वह अमर कथा, जिसने काल के नियमों को भी बदल दिया।
ऋषि मृकंडु की तपस्या और शिव वरदान
पौराणिक काल में महर्षि मृकंडु और उनकी धर्मपत्नी सुव्रता दीर्घकाल तक संतान सुख से वंचित थे। संतान प्राप्ति की कामना से उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या की। उनकी निष्ठा से प्रसन्न होकर आशुतोष भगवान शिव प्रकट हुए और एक कठिन विकल्प रखा….
* पहला विकल्प: गुणहीन लेकिन दीर्घायु (लंबी उम्र वाला) पुत्र।
* दूसरा विकल्प: अल्पायु (मात्र 16 वर्ष की आयु वाला) किंतु परम ज्ञानी और सर्वगुण संपन्न पुत्र।
महर्षि मृकंडु ने बिना किसी संकोच के सर्वगुण संपन्न और ज्ञानी पुत्र का वरदान चुना। समय आने पर उनके घर एक तेजस्वी बालक ने जन्म लिया, जिसका नाम मार्कंडेय रखा गया।

महामृत्युंजय मंत्र की शक्ति और यमराज का आगमन
बालक मार्कंडेय बचपन से ही भगवान शिव की भक्ति में लीन रहते थे। जब उन्हें अपनी अल्पायु का ज्ञान हुआ, तो वे विचलित होने के बजाय दिन-रात शिवलिंग के सम्मुख बैठकर महामृत्युंजय मंत्र का अखंड जाप करने लगे।
देखते ही देखते 16 वर्ष की अवधि पूर्ण हो गई और यमदूत उनके प्राण हरने पहुंचे। किंतु बालक की तपस्या और शिव भक्ति के प्रचंड तेज के आगे यमदूत टिक न सके और विवश होकर लौट गए। अंततः स्वयं मृत्यु के देवता यमराज बालक मार्कंडेय के प्राण लेने पहुंचे।
जब यमराज ने बालक पर अपना पाश (मृत्यु का फंदा) फेंका, तब बालक मार्कंडेय भयभीत होकर शिवलिंग से लिपट गए। यमराज का पाश जैसे ही मार्कंडेय के साथ शिवलिंग पर पड़ा, संपूर्ण ब्रह्मांड कंपित हो उठा।

महादेव का रौद्र रूप और अमरता का आशीष
अपने अनन्य भक्त को संकट में देख भगवान शिव उसी क्षण शिवलिंग को चीरकर ‘कालजयी’ रूप में प्रकट हो गए। महादेव का यह प्रचंड और रौद्र रूप देखकर यमराज थर-थर कांपने लगे।
भगवान शिव ने यमराज को सचेत करते हुए कहा— “जो मेरी शरण में है, उसका काल भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”
महादेव के आदेश पर यमराज को बिना प्राण लिए ही लौटना पड़ा। भगवान भोलेनाथ ने बालक मार्कंडेय के दृढ़ विश्वास और समर्पण से प्रसन्न होकर उन्हें चिरंजीवी (अमरता) और पूर्ण आरोग्यता का वरदान दिया। यही बालक आगे चलकर अमर मुनि ऋषि मार्कंडेय के नाम से प्रसिद्ध हुए, जिन्होंने मार्कंडेय पुराण की रचना की।
कथा का सार
सावन सोमवार की यह पावन कथा हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा, नियम और समर्पण से की गई शिव पूजा अकाल मृत्यु और भय को भी समाप्त कर देती है।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
डिस्क्लेमर: यह कथा सनातन धर्म की पौराणिक मान्यताओं और धार्मिक ग्रंथों पर आधारित है। बिंदास बोल न्यूज़ इसकी पुष्टि नहीं करता है।
