Upper Caste Voters :मिशन 2027: क्या ‘कोर वोटबैंक’ को छिटकने से बचाने के लिए बैकफुट पर आई सरकार?

Siddarth Saurabh

Upper Caste Voters : ​चुनावी बिगुल बजने से पहले भारतीय जनता पार्टी ने अपने सबसे मजबूत गढ़ यानी सवर्ण वोट बैंक को साधे रखने के लिए रणनीतिक बिसात बिछा दी है। हाल के दिनों में नीतिगत स्तर पर लिए गए दो फैसलों ने सियासी गलियारों में बहस छेड़ दी है कि क्या पार्टी अपने पारंपरिक मतदाताओं की नाराजगी का कोई जोखिम नहीं लेना चाहती।

​सियासी नब्ज साधने वाले दो बड़े नीतिगत कदम

* ​जाति जनगणना में उपजातियों पर ब्रेक: केंद्र सरकार के जातिगत गणना से जुड़े हालिया प्रारूप में जातियों को उपजातियों में विभाजित नहीं करने की रणनीति अपनाई गई है। विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम का सीधा मकसद सवर्ण तबके के भीतर संभावित बिखराव को रोककर उनकी सामाजिक व राजनीतिक एकजुटता को बनाए रखना है।

* ​यूजीसी इक्विटी नियमों पर ‘यू-टर्न’ के संकेत: विश्वविद्यालयों में लागू होने वाले यूजीसी इक्विटी नीति 2026 को लेकर सामान्य वर्ग के छात्रों और युवाओं में बढ़ती बेचैनी के बीच, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस पर पुनर्विचार करने की बात कही है। इसे सवर्ण समाज की चिंताओं को शांत करने के बड़े प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

​यूपी की सियासत में ‘सवर्ण समीकरण’ क्यों है निर्णायक?

​उत्तर प्रदेश की कुल आबादी में सवर्णों की हिस्सेदारी लगभग 15 से 19 प्रतिशत मानी जाती है। संख्याबल के साथ-साथ यह वर्ग अपने संगठित और रणनीतिक मतदान के लिए जाना जाता है….

* ​ब्राह्मण: लगभग 9–10%

* ​ठाकुर (राजपूत): लगभग 5%

* ​वैश्य (बनिया) व भूमिहार: लगभग 2-2%

* ​कायस्थ व अन्य जातियां: शेष हिस्सेदारी

​चुनावी गणित: 79% वोट और 50% सांसदों की ताकत

​चुनावी आंकड़ों के अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी के करीब 79% सवर्ण मतदाताओं ने एनडीए के पक्ष में मतदान किया था। पार्टी के जीते हुए 33 सांसदों में से लगभग आधे (17 सांसद) इसी वर्ग से आते हैं।
​इतिहास गवाह है कि जब भी यह वोटबैंक खिसका, यूपी की सत्ता का संतुलन बदला—चाहे वह 2007 में सोशल इंजीनियरिंग के जरिए बसपा की सरकार बनना हो या 2012 में सपा को मिला अप्रत्याशित समर्थन। 2014, 2017, 2019 और 2022 में बीजेपी की जीत की नींव इसी मजबूत आधार पर टिकी रही है।

​सियासी संदेश

​आगामी विधानसभा चुनावों की चुनौती को देखते हुए बीजेपी यह संदेश देने की पूरी कोशिश में है कि पिछड़ों और वंचितों को जोड़ने की मुहिम में उसका पारंपरिक आधार किसी भी सूरत में उपेक्षित महसूस न करे। इन दोनों नीतिगत कदमों को उसी ‘डैमेज कंट्रोल’ और संतुलन साधने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

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