West Bengal Election : जब ‘सिस्टम’ से लड़ने के लिए एक माँ खुद मैदान में उतरी!

Bindash Bol

मानव बोस (कोलकाता)

West Bengal Election : बंगाल की राजनीति में ‘मां, माटी, मानुष’ का नारा दशकों से गूंज रहा है, लेकिन आज उसी बंगाल की कोख से एक ऐसी आवाज़ उठी है जिसने सत्ता के गलियारों में सन्नाटा पसरा दिया है। उत्तर 24 परगना की पानीहाटी विधानसभा सीट अब महज एक चुनावी क्षेत्र नहीं, बल्कि एक माँ के न्याय की लड़ाई का कुरुक्षेत्र बन गई है।

कौन हैं रत्ना देबनाथ?

​रत्ना देबनाथ कोई पेशेवर राजनेता नहीं हैं। वह उस होनहार महिला डॉक्टर की माँ हैं, जिसकी आर.जी. कर अस्पताल में हुई नृशंस दरिंदगी ने पूरे देश की आत्मा को झकझोर दिया था। जहाँ सत्ता और रसूख के गठजोड़ ने न्याय की आवाज़ को दबाने की कोशिश की, वहीं आज उसी पीड़ित बेटी की माँ, रत्ना देबनाथ, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के टिकट पर चुनावी समर में उतरी हैं।

बौद्धिकों का मौन और नैतिक पराजय

​बंगाल का वह ‘बुद्धिजीवी’ समाज, जो बात-बात पर मोमबत्तियाँ जलाता है और अवार्ड वापसी की बात करता है, आज रत्ना देबनाथ की उम्मीदवारी पर निरुत्तर है।

* सवाल यह है: क्या ममता बनर्जी के समर्थक अब भी उन जीवन मूल्यों का बचाव कर पाएंगे?

* अभूतपूर्व एकजुटता: याद कीजिए वह दौर जब जूनियर डॉक्टरों ने दीदी की “चाय” ठुकरा दी थी। वह चाय का प्याला नहीं, बल्कि सत्ता के अहंकार को दिया गया जवाब था।

​रत्ना का चुनाव लड़ना उन लोगों के चेहरे से नकाब उतार रहा है जो खुद को प्रगतिशील कहते हैं लेकिन सत्ता की मलाई के सामने मौन साधे हुए हैं।

हिंदी पट्टी के ‘ड्राइंग रूम’ बौद्धिकों पर कड़ा प्रहार

​यह रिपोर्ट केवल बंगाल तक सीमित नहीं है। यह हिंदी पट्टी के उन तथाकथित ‘इंटलेक्चुअल्स’ पर भी करारा तंज है जिनकी सक्रियता अब केवल टीवी स्क्रीन, सोशल मीडिया के थ्रेड्स और जयपुर के चाय-समोसे वाली चर्चाओं तक सिमट गई है।
​”जब समाज के आदर्श दांव पर हों, तब बौद्धिकों की चुप्पी उनकी अनैतिकता का सबसे बड़ा प्रमाण होती है।”

क्यों महत्वपूर्ण है यह चुनाव?

​भाजपा ने रत्ना देबनाथ को टिकट देकर केवल एक चुनावी चाल नहीं चली है, बल्कि इसे ‘हिंदू जागरण’ और ‘न्याय की लड़ाई’ का प्रतीक बना दिया है। तृणमूल कांग्रेस के लिए यह स्थिति सबसे विकट है, क्योंकि वे जानते हैं कि एक “घायल माँ” का सामना करना किसी भी राजनीतिक व्यूह रचना से कहीं अधिक कठिन है।

असर क्या होगा?

* नैतिक बढ़त: जीत-हार अपनी जगह है, लेकिन रत्ना का मैदान में होना ही भाजपा की नैतिक जीत है।

* युवा नेतृत्व का उदय: पुराने ढर्रे के बौद्धिकों के पतन के साथ ही अब बंगाल और हिंदी पट्टी में एक नया, जुझारू और यथार्थवादी युवा नेतृत्व उभरने को तैयार है।

माँ विजयी भव!

​पानीहाटी की सड़कों पर जब रत्ना देबनाथ निकलेंगी, तो वह केवल वोट नहीं मांगेंगी, बल्कि उस सिस्टम से हिसाब मांगेंगी जिसने उनकी बेटी को नहीं बचाया। यह लड़ाई अब सत्ता के लिए नहीं, बल्कि समाज की मर्यादा को पुनर्स्थापित करने के लिए है।

​क्या बंगाल का समाज अपनी इस माँ का साथ देगा? क्या आदर्शों की यह लड़ाई राजनीति की दिशा बदलेगी? उत्तर आपके भीतर है।

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