West Bengal Politics : बंगाल में महाराष्ट्र जैसे सियासी संकट की आहट! ‘असली TMC’ की जंग, बागी विधायकों ने बढ़ाया सियासी तापमान

Bindash Bol

* क्या बंगाल में भी पार्टी टूट की पटकथा लिखी जा रही है?

* बंगाल- बागी TMC विधायक ऋतब्रत-संदीपन विधानसभा पहुंचे:50 विधायक साथ होने का दावा, स्पीकर से मिल सकते हैं, TMC सिंबल की मांग

West Bengal Politics : पश्चिम बंगाल में चुनाव में हार का सामना करने वाली तृणमूल कांग्रेस में अंदरुनी विवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। पार्टी में असली TMC होने की जंग शुरू हो गई है। पार्टी के कई बागी विधायक पश्चिम बंगाल विधानसभा पहुंच गए। ये विधायक स्पीकर रथिन घोष को नेता प्रतिपक्ष के चुनाव के संबंध में पत्र सौंपेंगे और यह दावा करेंगे कि वे ही असली TMC है।

विधानसभा पहुंचने वाले प्रमुख बागी विधायकों में ऋतब्रत बंद्योपाध्याय, संदीपान साहा, सबीना यास्मीन, अखरुज्जमां और कई अन्य विधायक शामिल हैं। संदीपन साहा ने दावा करते हुए कहा कि उनके पास दो तिहाई विधायकों से ज्यादा समर्थन हासिल है।

ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) दो गुटों में बंट सकती है। TMC से निकाले गए 2 विधायक संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी बुधवार सुबह 11 बजे विधानसभा पहुंचे। वे यहां स्पीकर से मिलकर 50 से ज्यादा विधायकों के समर्थन का दावा पेश कर सकते हैं।

बागी विधायक स्पीकर के सामने तीन मुद्दे उठाएंगे। पहला- हम ही असली तृणमूल कांग्रेस हैं। दूसरा- विपक्ष के नेता ऋतब्रत होंगे, न कि शोभनदेव। तीसरा- हमारे पास दो-तिहाई बहुमत है, इसलिए चुनाव चिह्न हमारा होना चाहिए।

बंगाल में TMC के 80 विधायक हैं। नए गुट को मान्यता के लिए दो-तिहाई यानी 54 विधायकों की जरूरत होगी। इससे कम विधायक होने पर स्पीकर नए गुट को मान्यता नहीं देंगे।

सोमवार को संदीपन और ऋतब्रत ने कोलकाता के MLA हॉस्टल में TMC के कई विधायकों के साथ मीटिंग की। इसमें ममता के कई खास विधायक भी शामिल हुए थे।

TMC टूट की 3 संभावनाएं…

पहली: दो तिहाई विधायक भाजपा में शामिल हों। TMC के कुल 80 विधायकों में से दो तिहाई (54 विधायक) भाजपा में शामिल होने का फैसला लें। ऐसे में दलबदल कानून नहीं लगेगा। हालांकि भाजपा ने इनकार कर दिया है।

दूसरी: TMC में 2 गुटों में बंट जाए। एक ग्रुप पार्टी से अलग होकर असली TMC का दावा करे। इसके लिए भी 54 विधायकों के समर्थन की जरूरत होगा। अगर ऐसा होता है तो बड़े गुट के दावे पर चुनाव आयोग फैसला लेगा। मामला कोर्ट भी जा सकता है। हालांकि इसके लिए दो-तिहाई यानी 28 में से 19 लोकसभा सांसदों की भी जरूरत भी होगी।

किसी पार्टी के बागी नेताओं के लिए सिर्फ विधानसभा संख्या ही निर्णायक नहीं होती। शिवसेना और NCP मामलों में निर्वाचन आयोग ने केवल विधायक नहीं देखे थे, बल्कि यह भी देखा था कि कितने सांसद किसके साथ हैं, पार्टी संगठन किसके साथ है, अधिकृत पदाधिकारी किसके साथ हैं।
अगर नया गुट सांसदों को अपनी तरफ नहीं ला पाता है तो उन्हें विधानसभा में नेता विपक्ष का पद तो मिल सकता है, लेकिन पार्टी का नाम और चिन्ह नहीं मिल सकता। अगर TMC के विधायक टूट जाएं, लेकिन सांसद, संगठन, जिला अध्यक्ष, राज्य कमेटी और पार्टी संविधान का कंट्रोल ममता के पास रहे, तो बागी गुट को नया दल बनाना पड़ सकता है।

तीसरा: नया गुट अलग होकर अपनी नई पार्टी बना सकता है। इसके लिए भी 54 विधायकों को एक साथ TMC छोड़कर नई पार्टी में शामिल होना पड़ेगा।

इस मामले में संविधान क्या कहता है

अगर किसी राष्ट्रीय/राज्य स्तर की पार्टी के विधायक बागी हो जाएं, तो वे सीधे पार्टी पर दावा नहीं कर सकते। यह मामला मुख्य रूप से दसवीं अनुसूची में दिए दलबदल कानून, पार्टी संगठन के संविधान और निर्वाचन आयोग के नियमों से तय होता है।

91वें संविधान संशोधन (2003) के बाद कम से कम दो-तिहाई विधायक मूल पार्टी से अलग होने का निर्णय लेते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से छूट मिल सकती है। इसके बाद चुनाव आयोग यह जांच करता है कि पार्टी पर असली नियंत्रण किसका होगा। इसके लिए 4 पॉइंट तय हैं…

* पार्टी संगठन किसके साथ है?

* राष्ट्रीय/राज्य कार्यकारिणी किसके साथ है?

* पार्टी संविधान क्या कहता है?

* चुने हुए प्रतिनिधियों का समर्थन किसे है?

फर्जी साइन की शिकायत करने पर निकाले गए 2 विधायक

सोमवार को ममता बनर्जी ने TMC से 2 विधायक संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी को पार्टी से निकाल दिया था। दोनों ने स्पीकर से शिकायत की थी कि पार्टी ने शोभनदेव को नेता विपक्ष बनाने वाले प्रस्ताव में उनके उनके फर्जी साइन किए थे। साहा और बनर्जी का आरोप है कि यह शिकायत करने पर ही दोनों TMC से निकाले गए।

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