West Bengal Politics : ​बंगाल: राष्ट्रवाद के पुनरुत्थान और महासंघर्ष की गाथा

Madhukar Srivastava

West Bengal Politics :​पश्चिम बंगाल की राजनीति आज जिस मोड़ पर खड़ी है, उसकी नींव दशकों पहले उन संघर्षों से रखी गई थी, जब ‘भगवा’ का नाम लेना भी वामपंथी दुर्ग में एक चुनौती माना जाता था। यह कहानी है उस ‘मिट्टी’ की, जिसने भारत को राष्ट्रगान दिया, और उस ‘चेतना’ की, जिसे समय की धूल ने ढंकने की कोशिश की।

​1. 1991: विक्टर बनर्जी और वह शुरुआती चिंगारी

​जब हम आज बंगाल में भाजपा के उभार को देखते हैं, तो हमें 1991 के उस दौर को नहीं भूलना चाहिए। वह समय जब भाजपा खुद को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर रही थी। उस दौर में विक्टर बनर्जी जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अभिनेता का भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ना कोई सामान्य घटना नहीं थी।

* ​साहस का परिचय: उस समय बंगाल में लाल झंडे का खौफ चरम पर था। कांग्रेस ढलान पर थी और तृणमूल का जन्म भी नहीं हुआ था।

* ​तीसरा स्थान, पर गहरी छाप: विक्टर बनर्जी भले ही चुनाव हार गए, लेकिन उन्होंने बंगाल के भद्रलोक और आम जनमानस के बीच भाजपा की वैचारिक उपस्थिति दर्ज करा दी थी। वह हार ‘हार’ नहीं, बल्कि भविष्य के महासंघर्ष की पहली आहट थी।

2. राष्ट्रवाद का उद्गम स्थल: बलिदानों की विरासत

​भाजपा के लिए बंगाल केवल एक राज्य नहीं, बल्कि उसका वैचारिक उद्गम (Origin) है। भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसी मिट्टी की संतान थे।

* ​क्रांतिकारी ऊर्जा: बंगाल ने भारत को ‘वंदे मातरम्’ जैसा मंत्र दिया। ऋषि अरविंदो का आध्यात्मिक राष्ट्रवाद, रासबिहारी बोस की रणनीति और नेताजी सुभाष चंद्र बोस का अदम्य साहस—यह सब बंगाल की थाती है।

* ​आनंदमठ की चेतना: बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का ‘आनंदमठ’ आज भी रक्त में राष्ट्रवाद का संचार करता है। जिस बंगाल ने भारत को ‘गरम दल’ दिया, उसे ‘धिम्मी’ और छद्म-सेक्युलरवाद की बेड़ियों में जकड़ना इतिहास के साथ अन्याय जैसा है।

3. वामपंथ से तृणमूल तक: एक लंबा वनवास

​दशकों तक वामपंथी शासन ने बंगाल की उस प्रखर हिंदू चेतना और राष्ट्रवादी सोच को कुचलने का प्रयास किया। शिक्षा, संस्कृति और राजनीति के माध्यम से एक ऐसी पीढ़ी तैयार करने की कोशिश की गई जो अपनी जड़ों से कट जाए।

​”भाजपा का संघर्ष वहां की सत्ता हथियाने के लिए नहीं, बल्कि उस ‘सोए हुए तेज’ को जगाने के लिए है जिसे श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अखंड भारत के सपने में देखा था।”

​4. वर्तमान महासंघर्ष: राष्ट्र चेतना की पुनर्स्थापना

​आज भाजपा बंगाल में जिस आक्रामकता के साथ लड़ रही है, उसके पीछे वही पुराना संकल्प है। बंगाल को फिर से उस केंद्र पर लाना है जहाँ से वह पूरे देश को दिशा दिखाता था।

* ​भावनात्मक जुड़ाव: भाजपा जानती है कि बंगाल जीते बिना भारत की सांस्कृतिक आत्मा अधूरी है।

* भविष्य की चुनौती: उत्तराखंड की वादियों में एकांतवास गुजार रहे विक्टर बनर्जी से लेकर आज के जमीनी कार्यकर्ता तक, सबका लक्ष्य एक ही है—बंगाल को फिर से राष्ट्रवाद की ज्वाला बनाना।

बंगाल का संघर्ष चुनावी जीत-हार से परे है। यह ‘सोनार बांग्ला’ की उस गरिमा को वापस पाने की लड़ाई है, जहाँ राष्ट्रवाद केवल नारा नहीं, बल्कि जीवन पद्धति थी। भाजपा की जड़ें वहां बहुत गहरी हैं, और यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक ‘वंदे मातरम्’ की वह गूंज फिर से बंगाल के कण-कण में राष्ट्र-चेतना का संचार न कर दे।

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