Kavi Goshti : झारखण्ड हिन्दी साहित्य संस्कृति मंच की मासिक ऑनलाइन काव्यगोष्ठी इस बार पावस ऋतु को समर्पित विशेष आयोजन ‘पावस स्वरांजलि’ के रूप में आयोजित हुई। मंच के कार्यकारी अध्यक्ष निरंजन प्रसाद श्रीवास्तव की अध्यक्षता में संपन्न इस साहित्यिक संध्या में देशभर के रचनाकारों ने वर्षा, प्रकृति, प्रेम, विरह, देशभक्ति और मानवीय संवेदनाओं से सराबोर अपनी रचनाओं का सस्वर पाठ कर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मंच की उपाध्यक्ष डॉ. सुरिन्दर कौर ‘नीलम’ द्वारा सरस्वती वंदना से हुआ। इसके बाद मंच के कोषाध्यक्ष कृष्ण विश्वकर्मा ‘बादल’ ने सभी साहित्यकारों और श्रोताओं का स्वागत करते हुए काव्यगोष्ठी की औपचारिक शुरुआत की।
काव्यपाठ के दौरान कल्याणी झा ‘कनक’, डॉ. गीता सिन्हा ‘गीतांजलि’, सुजाता प्रिय ‘समृद्धि’, अर्पणा सिंह, डॉ. सुरिन्दर कौर ‘नीलम’, राज रामगढ़ी, आसित कुमार, हिमकर श्याम, कामेश्वर कुमार सिंह ‘कामेश’, कृष्ण विश्वकर्मा ‘बादल’, ममता मनीष सिन्हा तथा पूनम वर्मा ने अपनी-अपनी रचनाओं के माध्यम से पावस ऋतु की मनोहारी छवियों, प्रकृति की सुषमा, मानवीय भावनाओं और सांस्कृतिक चेतना को सजीव रूप में प्रस्तुत किया। गीत, ग़ज़ल, दोहे और मुक्तक की विविध विधाओं से सजी इस काव्य संध्या में शब्दों की ऐसी रसधार बही कि श्रोता पूरे समय साहित्यिक आनंद में डूबे रहे।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में निरंजन प्रसाद श्रीवास्तव ने वर्षा ऋतु को जीवन, सृजन और संवेदनाओं का प्रतीक बताते हुए भारतीय साहित्य में पावस की समृद्ध परंपरा पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपना चर्चित गीत—“जब-जब पूरवा पठाती है पाती, दौड़े-दौड़े आते हैं मतवाले बादल, कजरारे बादल”—सुनाकर पूरे वातावरण को भावमय बना दिया।
कार्यक्रम में विजय रंजन सिन्हा, विशाल कुमार और सुनीता अग्रवाल ‘पिंकी’ दर्शक के रूप में उपस्थित रहे। अंत में हिमकर श्याम ने सभी प्रतिभागियों, श्रोताओं और आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया। धन्यवाद ज्ञापन के साथ काव्यगोष्ठी का सफल समापन हुआ।
‘पावस स्वरांजलि’ ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि साहित्य की संवेदनाएँ समय, दूरी और माध्यम की सीमाओं से परे होकर भी लोगों के हृदय तक सहजता से पहुँचती हैं।