Student Politics :छात्र राजनीति: विरोध का अधिकार या राष्ट्र निर्माण में रुकावट?

Bindash Bol

* Student Politics : जर्मनी-जापान की सीख: क्या भारत में बदलेगा प्रदर्शन और छात्र राजनीति का तरीका?

* Student Politics : आंदोलन के नाम पर तोड़-फोड़ नहीं: भारतीय छात्र राजनीति में परिपक्वता की दरकार

* Student Politics : “पढ़ाई या प्रदर्शन: छात्र राजनीति के लिए कड़े नियमों की क्यों है जरूरत?”

कुमार पद्मनाभ

Student Politics : बिहार बोर्ड से सातवीं कक्षा की पढ़ाई के दौरान हिंदी का एक अध्याय पढ़ा था, जिसका शीर्षक था ‘कहाँ आ गया’। यदि मुझे ठीक से याद आता है, तो इसके लेखक राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह थे। इस पाठ में उन्होंने अपनी जर्मनी यात्रा का संस्मरण बड़े ही तीखे व्यंग्य के साथ साझा किया था। उन्होंने लिखा था कि जर्मनी प्रवास के दौरान उन्होंने कभी किसी शिक्षक या छात्र को प्रदर्शन करते नहीं देखा। उन्होंने व्यंग्य करते हुए लिखा कि यहाँ के छात्रों का जीवन बड़ा नीरस है; वे न तो विरोध प्रदर्शन करते हैं, न परीक्षा की तारीख बढ़ाने के लिए धरना देते हैं और न ही कुलपतियों का घेराव करते हैं। उनका काम सिर्फ पढ़ाई करना है और यह कितना बोरिंग काम है।

बचपन में पढ़ा यह व्यंग्य वर्षों तक मेरे दिमाग में कौंधता रहा। फिर वर्ष 2012 में मैंने एक जर्मन कंपनी में काम करना शुरू किया और काम के सिलसिले में मेरा वहाँ कई बार आना-जाना हुआ। वहाँ पहुँचकर मैंने देखा कि जर्मनी में प्रजातंत्र भारत की तरह ही बहुत अच्छी तरह फल-फूल रहा है और जनता की पूरी हिस्सेदारी है। लेकिन इसके बावजूद वहाँ छात्र कभी पढ़ाई छोड़कर प्रदर्शन नहीं करते। अगर आम नागरिक और छात्र मिलकर प्रदर्शन करते भी हैं, तो उसका एक तय समय होता है। मुझे याद है स्टटगार्ट शहर की एक घटना, जहाँ सरकार एक पुल बना रही थी और उससे कुछ पेड़ कट रहे थे। स्थानीय लोग इसके विरोध में थे। वे हर सोमवार शाम चार बजे सूट-बूट और टाई पहनकर सड़क पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने आते थे, लेकिन जैसे ही शाम के सात बजते, प्रदर्शन अपने आप समाप्त हो जाता। सोमवार रात से लेकर रविवार तक पूरे हफ्ते कोई हंगामा या काम में व्यवधान नहीं होता था।

इसके बाद मैंने जापान के लोकतंत्र और वहाँ के विरोध प्रदर्शन के तरीकों को समझने की कोशिश की। जापान में भी मजबूत प्रजातंत्र है और वहाँ के लोगों को काम करने की अद्भुत लत है। वे विरोध के नाम पर कभी उत्पादकता को नुकसान नहीं पहुँचाते, न ट्रेनें रोकते हैं और न ही पढ़ाई का नुकसान करते हैं। उनका विरोध करने का तरीका ही अलग है, जिसे ‘जैपनीज वे ऑफ प्रोटेस्ट’ कहा जाता है। इसमें उत्पादकता में कमी लाए बिना उद्योगपति पर दबाव बनाया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी उत्पाद में सौ पुर्जे लगते हैं, तो कर्मचारी नब्बे पुर्जे बनाते हैं और दस पुर्जों का निर्माण रोक देते हैं। इससे अंतिम उत्पाद तैयार नहीं होता, मालिक का राजस्व रुक जाता है और वह बातचीत की मेज पर आता है। माँगें पूरी होते ही वे बचे हुए पुर्जे बनाकर रुका हुआ राजस्व वापस ले आते हैं। इसी तरह जूतों की फैक्ट्री में हड़ताल के दौरान केवल एक पैर का जूता बनाया जाता है। यहाँ राष्ट्रीय संपत्ति का नुकसान नहीं होता, केवल राजस्व में कुछ समय का विलंब होता है।

दूसरी ओर, जब भारत में धरना-प्रदर्शन होता है, तो सबसे पहला नुकसान हमारी सार्वजनिक संपत्ति का होता है। बसें रोकना, ट्रेनें ठप्प करना, पुलिस की गाड़ियाँ पलट देना और सरकारी संपत्ति में तोड़-फोड़ करना आम बात बन गई है। जो लोग यह तोड़-फोड़ करते हैं, शायद वे नहीं समझते कि इस संपत्ति का पैसा कहाँ से आता है। चाहे सरकार उपद्रवियों से वसूली करे या फिर जनता के टैक्स के पैसे से उसे दोबारा बनाए, नुकसान अंततः हमारा ही होता है। अपनी ही चीज़ों का नुकसान करके सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश करना कोई विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ हिंसा और अराजकता है।

इसलिए भारत में भी छात्रों और संगठनों के विरोध प्रदर्शनों के लिए स्पष्ट नियम बनने चाहिए। जर्मनी की तरह प्रदर्शन का स्थान और समय सीमा तय होनी चाहिए, जैसे जंतर-मंतर पर दो या चार घंटे का समयबद्ध विरोध। इस दौरान किसी भी सरकारी संपत्ति को नुकसान न पहुँचे और प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले नेताओं की यह जिम्मेदारी हो कि वे हिंसा फैलाने वाले उपद्रवियों की सूची सरकार को सौंपें। अनिश्चितकालीन चक्काजाम और कुछ भी कर देने की छूट किसी को नहीं मिलनी चाहिए।

आखिरकार छात्रों का मूल काम पढ़ाई करना और राष्ट्र निर्माण में योगदान देना है, उन्हें इस तरह के विनाशकारी लफड़ों से दूर रहकर एक परिपक्व नागरिक बोध का परिचय देना चाहिए।

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