Jharkhand Paper Leak : JSSC-CGL पेपर लीक महाघोटाला: 12-12 लाख में बिके सवाल, CID की पूछताछ में अभय तिवारी ने खोले ऐसे राज कि दहल उठा झारखंड!

Bindash Bol

Jharkhand Paper Leak : झारखंड की साख और लाखों युवाओं के भविष्य को एक बार फिर भ्रष्ट तंत्र और दलालों के कॉकस ने नीलाम कर दिया है। JPSC मेधा घोटाले का मास्टरमाइंड अभय तिवारी जब CID के शिकंजे में आया, तो उसने JSSC-CGL परीक्षा में हुए इतने संगीन और दुस्साहसिक खेल का पर्दाफाश किया कि पूरे प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया है। सच सामने आ चुका है—सितंबर 2024 में आयोजित JSSC-CGL परीक्षा कोई पारदर्शी परीक्षा नहीं, बल्कि बोलियों और सौदों की मंडी थी!

बोकारो का ‘सीक्रेट अड्डा’ और 65 सवालों की रटंत: 1.80 करोड़ की खुली लूट

​मेधावी छात्र दिन-रात एक कर किताबें चाटते रहे और दूसरी तरफ बोकारो के एक ठिकाने पर धांधली का नंगा नाच चल रहा था। अभय तिवारी के कबूलनामे ने साफ कर दिया है कि किस तरह करीब 45 अभ्यर्थियों को एक घर में बंधक की तरह रखकर JSSC-CGL के 65 प्रश्नोत्तर घोटकर रटवाए गए। प्रति अभ्यर्थी 12-12 लाख रुपये की बोली लगी और पलक झपकते ही 1.80 करोड़ रुपये की अवैध वसूली कर ली गई। यह सिर्फ एक परीक्षा का पर्चा लीक होना नहीं, बल्कि झारखंड के युवाओं के पसीने की सरेआम डकैती है।

प्रिंटिंग से लेकर मेरिट लिस्ट तक साठगांठ: कौन है वेबल कंपनी और पर्दे के पीछे के आका?

​सवाल सिर्फ दलालों पर नहीं, बल्कि उस परीक्षा एजेंसी ‘वेबल’ पर भी खड़े होते हैं जिसे प्रश्नपत्रों की छपाई का जिम्मा सौंपा गया था। क्या एजेंसी की मिलीभगत के बिना प्रश्नपत्र लीक होना संभव था? अभय तिवारी के बयानों ने साफ कर दिया है कि मिथिलेश सिंह और उमाकांत प्रमाणिक जैसे किरदार इस पूरे सिंडिकेट को चला रहे थे। इस तंत्र की निर्लज्जता का आलम तो देखिए—खुद अभय तिवारी (रैंक 48), उसका भाई अक्षय तिवारी और उसकी पत्नी सुषमा कुमारी सब के सब इस परीक्षा में ‘सफल’ हो गए। 13 साल में 12 परीक्षाएं पास करने वाला यह ‘मुन्नाभाई’ सरकारी कुर्सी हासिल कर चुका था और राज्य का सिस्टम गहरी नींद सो रहा था।

अब लीपापोती नहीं, अंतिम प्रहार चाहिए!

​हर बार परीक्षा होती है, हर बार पेपर बिकता है और हर बार जांच का नाटक रचा जाता है। JSSC-CGL की साख अब पूरी तरह तार-तार हो चुकी है। CID की जांच केवल अभय तिवारी या कुछ मोहरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। प्रश्नपत्र छापने वाली एजेंसी वेबल के आकाओं से लेकर इस सिंडिकेट को संरक्षण देने वाले बड़े मगरमच्छों की गर्दन नापना वक्त की मांग है। झारखंड के लाखों अभ्यर्थियों का गुस्सा अब उफान पर है—जब तक इस भ्रष्ट नेटवर्क का जड़ से सफाया नहीं होता, यह आंदोलन थमने वाला नहीं है!

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