Re-Election : SIR विवाद और 5 राज्यों में दोबारा चुनाव की मांग: जानिए क्या कहता है चुनाव आयोग और कानून का नियम

Bindash Bol

Re-Election : चुनाव आयोग को लेकर इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के बाद सियासी घमासान  जारी है । बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, दिल्ली और हरियाणा में विपक्षी दलों द्वारा दोबारा चुनाव कराने की मांग की जा रही है।
मतदाता सूची से नाम जुड़ने और हटने की प्रक्रिया तथा ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ (Logical Discrepancy) वाले नोटिसों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई चल रही है। सिर्फ राजनीतिक बयानों या मांग के आधार पर किसी भी राज्य में दोबारा चुनाव नहीं कराए जा सकते।

क्या वाकई 5 राज्यों में फिर से होंगे चुनाव?

​भारत में चुनाव की पूरी प्रक्रिया संविधान और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) के तहत संचालित होती है। वोटर लिस्ट तैयार करने से लेकर नतीजे घोषित होने तक हर चरण के लिए कड़े कानूनी नियम तय हैं।
​हाल ही में बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, दिल्ली और हरियाणा के चुनावों को लेकर विपक्षी नेताओं (जैसे तेजस्वी यादव और उद्धव ठाकरे) ने मतदाता सूची में गड़बड़ी और SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए नए सिरे से चुनाव कराने की मांग उठाई है। हालांकि, कानूनी रूप से सिर्फ राजनीतिक मांग के आधार पर पूरे राज्य में चुनाव रद्द नहीं किए जा सकते।

SIR और वोटर लिस्ट से क्यों गरमाई सियासत?

​ताजा विवाद SIR (Special Intensive Revision / Systematic Review) के दौरान मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर हुए बदलावों और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़ा है…

* ​पश्चिम बंगाल: चुनाव आयोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट को दी गई जानकारी के मुताबिक, SIR से जुड़े मामलों में लगभग 38.2 लाख से अधिक अपीलें दाखिल हुईं, जिनमें से अधिकांश पर अभी निस्तारण की प्रक्रिया चल रही है।

* ​दिल्ली और अन्य राज्य: ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ वाले नोटिस जारी करने की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है और अतिरिक्त जांच की जरूरत बताई है।

* ​विपक्ष के मुख्य आरोप: मतदाता सूची से नाम गायब होने, जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और चुनावी मशीनरी के दुरुपयोग जैसे आरोप लगाए जा रहे हैं।

क्या कहता है कानून?

(Representation of the People Act, 1951)
​कानून के मुताबिक चुनाव को चुनौती देने की एक निश्चित न्यायिक प्रक्रिया होती है…

* ​धारा 100: इसके तहत उच्च न्यायालय (High Court) के पास किसी विजयी उम्मीदवार के निर्वाचन को शून्य घोषित करने का अधिकार होता है। यह तभी संभव है जब भ्रष्ट आचरण या ऐसी गंभीर अनियमितता साबित हो जो सीधे तौर पर चुनाव के परिणाम को प्रभावित करती हो।

* न्यायिक समीक्षा: केवल आरोप लगाने भर से चुनाव अवैध नहीं हो जाते। इसके लिए अदालत में पुख्ता सबूत, वैध आपत्तियां और कानूनी प्रक्रिया से गुजरना अनिवार्य है।

फिलहाल पांच राज्यों में दोबारा चुनाव की मांग केवल एक राजनीतिक बयानबाजी है, न कि कोई आधिकारिक रूप से घोषित पुनर्मतदान (Re-election)। चुनावी भविष्य पूरी तरह से अदालतों में चल रही याचिकाओं, चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड और SIR से जुड़ी आपत्तियों के कानूनी निस्तारण पर ही निर्भर करेगा।

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