Monsoon Session :  संसद के आखिरी तीन दिन: विधेयकों पर घमासान, सरकार-विपक्ष आमने-सामने

Bindash Bol

Monsoon Session :  संसद के मॉनसून सत्र का आखिरी सप्ताह आज से शुरू हो रहा है और इसके साथ ही सदन में टकराव के आसार भी बढ़ गए हैं। अंतिम तीन दिनों में सरकार कई अहम विधेयकों को चर्चा और पारित कराने की तैयारी में है। इनमें FCRA में बदलाव, नारी शक्ति वंदन अधिनियम से जुड़े प्रावधान, डीलिमिटेशन, उच्च शिक्षा क्षेत्र के पुनर्गठन, वंदे मातरम् को कानूनी संरक्षण और ट्रिब्यूनल सुधार जैसे मुद्दे शामिल हैं। इन सबके बीच महिला आरक्षण, परिसीमन और FCRA बिलों को लेकर सरकार-विपक्ष की अगली चाल पर नजर रहेगी।

इन विधेयकों को लेकर पहले से ही राजनीतिक और वैचारिक बहस तेज है। खासकर विदेशी चंदे के नियमों में बदलाव से जुड़े FCRA बिल पर देश के साथ-साथ अमेरिका में भी सवाल उठाए जा रहे हैं। ऐसे में इस बिल पर संसद के भीतर टकराव तय माना जा रहा है।

कांग्रेस ने अपने सांसदों को व्हिप जारी कर सदन में अनिवार्य रूप से मौजूद रहने का निर्देश दिया है। साथ ही INDIA गठबंधन के सहयोगी दलों से भी पूरी ताकत के साथ सदन में मौजूद रहने की अपील की गई है। यानी सरकार के एजेंडे के सामने विपक्ष भी मोर्चा मजबूत करने की तैयारी में है।

मॉनसून सत्र के पहले दो सप्ताह में, यानी 20 जुलाई से 7 अगस्त के बीच, लोकसभा में छह और राज्यसभा में दो विधेयक पारित हो चुके हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार बहस और चर्चा से बचते हुए जल्दबाजी में विधेयक पारित करा रही है।

वहीं सत्ता पक्ष पलटवार करते हुए कह रहा है कि विपक्ष चर्चा में हिस्सा लेने के बजाय हंगामा कर रहा है और सदन की कार्यवाही बाधित कर रहा है।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, पिछले दो सप्ताह का गतिरोध बताता है कि सरकार और विपक्ष दोनों अपने-अपने रुख से पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। ऐसे में अंतिम तीन दिन भी विधायी कामकाज से ज्यादा राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन का अखाड़ा बन सकते हैं।

खास निगाह FCRA, डीलिमिटेशन और वंदे मातरम् से जुड़े प्रस्तावों पर रहेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार इन मुद्दों के जरिए एक बार फिर विपक्ष की राजनीतिक प्रतिक्रिया और जनता की नब्ज टटोलने की कोशिश कर सकती है। यानी संसद के आखिरी तीन दिन सिर्फ विधेयकों के पारित होने की कहानी नहीं, बल्कि सरकार के राजनीतिक एजेंडे बनाम विपक्ष की रणनीति की सीधी परीक्षा भी होंगे।

अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन-सा बिल पास होगा—सवाल यह है कि अंतिम तीन दिनों में संसद चलेगी या फिर सियासी टकराव के शोर में विधायी एजेंडा दब जाएगा?

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