* अभिव्यक्ति नहीं, अपमान का उत्सव! समाज किस दिशा में जा रहा है?
* गाली की संस्कृति: लोकतंत्र के लिए सबसे ख़ामोश ख़तरा
अमरेंद्र किशोर
Linguistic Grace : समाज का पतन हमेशा जंग, ग़रीबी या सियासत से शुरू नहीं होता; कई बार उसकी शुरुआत ज़बान से होती है। जब अल्फ़ाज़ अपनी हया खो देते हैं, तो ख़याल भी अपनी ऊँचाई खो बैठते हैं। आज हमारे सार्वजनिक जीवन में एक ख़तरनाक रवैया पनप रहा है—गाली को साहस कहा जा रहा है, अश्लीलता को प्रतिरोध और बदज़बानी को प्रगतिशीलता का नाम दिया जा रहा है। धरने हों, विश्वविद्यालय हों, सोशल मीडिया हो या राजनीतिक मंच—ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो जितनी अधिक अभद्रता, उतनी अधिक क्रांतिकारिता। यह केवल भाषा का बदलाव नहीं, समाज के मिज़ाज का बदलाव है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो शब्द कभी सामाजिक मर्यादा के बाहर माने जाते थे, आज उन्हें सार्वजनिक प्रदर्शन का हिस्सा बनाया जा रहा है। उनकी आलोचना नहीं, बल्कि उनका महिमामंडन किया जा रहा है।
यह मसला किसी एक दल, किसी एक विचारधारा या किसी एक आंदोलन का नहीं है। वर्षों से अलग-अलग राजनीतिक धाराओं ने अपने-अपने विरोधियों के लिए अपमानजनक शब्द गढ़े हैं, गालियों को नारों में बदला है और व्यक्तिगत अपमान को वैचारिक बहादुरी का लिबास पहनाया है। लेकिन असली सवाल यह नहीं कि गाली किसने दी; असली सवाल यह है कि समाज ने उसे स्वीकार क्यों कर लिया। सियासत समाज से पैदा होती है। अगर समाज अपनी ज़बान की हिफ़ाज़त नहीं करेगा, तो सियासत से तहज़ीब की उम्मीद करना भी बेमानी है। लोकतंत्र में विचारों का संघर्ष स्वाभाविक है, लेकिन जब संघर्ष की भाषा ही अपमान बन जाए, तब हार किसी विचार की नहीं, पूरी सभ्यता की होती है।
आज सबसे चिंताजनक बात यह है कि गालियों के पक्ष में फ़लसफ़े गढ़े जा रहे हैं। कोई कहता है यह यौनिक आज़ादी की ज़बान है, कोई इसे लैंगिक समानता की जंग बताता है, कोई इसे पितृसत्ता के ख़िलाफ़ बग़ावत कहता है। लेकिन सच यह है कि अपमान कभी इंसाफ़ की ज़मीन तैयार नहीं करता। किसी की गरिमा को रौंदकर बराबरी हासिल नहीं की जा सकती। गाली, चाहे किसी के भी मुँह से निकले, आख़िरकार इंसान की इज़्ज़त पर हमला करती है। उसे प्रतिरोध कहना, प्रतिरोध का भी अपमान है। कोई भी आंदोलन, चाहे वह कितना ही न्यायपूर्ण क्यों न हो, यदि अपनी नैतिक ऊँचाई खो देता है तो उसकी वैचारिक शक्ति भी क्षीण होने लगती है।
याद रखिए, गाली कभी निष्पक्ष नहीं होती। वह किसी की माँ, बहन, बेटी, पत्नी, शरीर, पहचान या आत्मसम्मान को निशाना बनाती है। इसलिए यह कहना कि “ये तो सिर्फ़ शब्द हैं”, ख़ुद को धोखा देना है। अगर शब्दों की कोई अहमियत नहीं होती, तो मोहब्बत भी शब्दों से व्यक्त न होती, संविधान भी शब्दों में न लिखा जाता और अदालतें भी फ़ैसले शब्दों में न सुनातीं। शब्दों में ताक़त होती है—वे पुल भी बनाते हैं और खाई भी। शरीर पर किया गया आघात समय के साथ भर सकता है, लेकिन शब्दों से किया गया आघात कई बार पूरी उम्र मनुष्य के भीतर जीवित रहता है। वह मन, स्मृति, आत्मविश्वास और व्यक्तित्व पर ऐसी चोट करता है जिसकी कोई एक्स-रे रिपोर्ट नहीं बनती, लेकिन जिसका दर्द वर्षों तक बना रहता है।
बीती शताब्दी का इतिहास बताता है कि इंसानों का नरसंहार केवल गोलियों और तलवारों से नहीं हुआ; उससे पहले भाषा ने मनुष्यों को अमानवीय घोषित किया। जातीय हिंसा हो, नस्लीय घृणा हो या सांप्रदायिक उन्माद—हर बड़े अत्याचार की शुरुआत शब्दों से हुई। पहले अपमानजनक शब्द गढ़े गए, फिर उन्हें सामान्य बनाया गया और अंततः मनुष्य की गरिमा ही संदेह के घेरे में डाल दी गई। आज जब हम गालियों का सार्वजनिक उत्सव देखते हैं, तो हमें सावधान होना चाहिए। यह किसी नरसंहार की तुलना नहीं, बल्कि इतिहास से मिलने वाली चेतावनी है कि जब भाषा मनुष्य का सम्मान छीनने लगती है, तब समाज धीरे-धीरे अपनी संवेदना खोने लगता है।
सोशल मीडिया ने इस बीमारी को और गहरा कर दिया है। अब तर्क नहीं, तंज़ बिकता है; विचार नहीं, विष फैलता है; संवाद नहीं, सनसनी वायरल होती है। जितनी बड़ी बदज़बानी, उतनी बड़ी वाहवाही। धीरे-धीरे एक पूरी नस्ल यह मानने लगी है कि सबसे ज़्यादा गाली देने वाला ही सबसे बड़ा बहादुर है। यह लोकतंत्र की नहीं, भीड़तंत्र की निशानी है। एल्गोरिद्म उत्तेजना को पुरस्कृत करते हैं और समाज धीरे-धीरे उसी भाषा का अभ्यस्त होता जाता है। सबसे बड़ा संकट यही है कि असभ्यता सामान्य लगने लगती है।
लेकिन एक सवाल हर उस व्यक्ति से पूछा जाना चाहिए जो गाली का समर्थन करता है। क्या वही गाली तब भी उतनी ही अच्छी लगेगी, जब उसका निशाना आप होंगे? सच यही है कि गाली तब तक आकर्षक लगती है, जब तक वह किसी और पर बरस रही होती है। जिस दिन वही शब्द आपकी माँ, आपकी बहन, आपकी बेटी या आपके परिवार पर टूटते हैं, उसी दिन सारी वैचारिक बहादुरी हवा हो जाती है। तब महसूस होता है कि शब्दों में भी तेज़ाब होता है। वह जिस्म नहीं जलाता, लेकिन रिश्तों, सम्मान और संवेदनाओं को भीतर तक झुलसा देता है। इसलिए गाली का समर्थन प्रायः सिद्धांत से नहीं, सुविधा से पैदा होता है।
अभिव्यक्ति की आज़ादी लोकतंत्र की रूह है, लेकिन हर आज़ादी के साथ ज़िम्मेदारी भी आती है। सरकार की आलोचना कीजिए, सत्ता से सवाल पूछिए, किसी विचारधारा का डटकर विरोध कीजिए—यह आपका हक़ है। लेकिन अगर आपके पास तर्क ख़त्म हो जाएँ और सिर्फ़ गालियाँ बचें, तो समझ लीजिए कि आपकी भाषा हार चुकी है, चाहे आपकी राजनीति जीत जाए। मज़बूत विचार को कभी बदज़बानी का सहारा नहीं लेना पड़ता। इतिहास में जिन लोगों ने समाज बदला, उन्होंने शब्दों को हथियार नहीं, प्रकाश बनाया।
हमें तय करना होगा कि आने वाली पीढ़ियों को कैसी ज़बान विरासत में देनी है। ऐसी, जिसमें असहमति हो लेकिन अदब भी हो; प्रतिरोध हो लेकिन मर्यादा भी हो; तेवर हो लेकिन तहज़ीब भी हो। अगर हमने गाली को संस्कृति, अश्लीलता को अभिव्यक्ति और अपमान को क्रांति मान लिया, तो हार किसी दल की नहीं होगी—हार पूरे समाज की होगी। सभ्यताएँ पहले अपनी ज़बान हारती हैं, फिर अपना ज़मीर।
इसलिए आज सबसे बड़ी ज़रूरत किसी विचारधारा की नहीं, ज़बान की हिफ़ाज़त की है। क्योंकि जब भाषा मर्यादा खो देती है, तब समाज बहुत देर तक सभ्य नहीं रह पाता। जिस समाज में शब्द ज़हर बन जाते हैं, वहाँ इंसान धीरे-धीरे इंसान को सुनना बंद कर देता है; और जहाँ सुनना बंद हो जाए, वहाँ संवाद मरता है, लोकतंत्र कमज़ोर पड़ता है और अंततः सभ्यता अपने ही शब्दों के मलबे तले दबने लगती है।