Parliament : संसद में फैशन शो या मोदियाबिंद का कहर? जब झारखंड के छात्रों की जगह ‘मोदी’ ही दिखे हर जगह!

Bindash Bol

Parliament : भारतीय राजनीति में इन दिनों एक नई बीमारी का प्रकोप तेज़ी से फैला है, जिसे डॉक्टरी भाषा में भले कुछ भी कहें, पर राजनीतिक गलियारों में इसे ‘मोदियाबिंद’ कहा जा रहा है। लक्षण बड़े सीधे हैं—दर्द पेट में हो या छात्र आंदोलन झारखंड में चल रहा हो, मरीज को सिर्फ ‘मोदी-मोदी’ ही सूझता है।

​हालिया नज़ारा संसद का है, जहां कांग्रेस के नेता जिस नए ‘क्रिएटिव चश्मे’ और पोस्टरों के साथ पहुंचे, उसे देखकर एक पल को लगा कि संसद का मानसून सत्र चल रहा है या फिर ‘निफ्ट’ (NIFT) का कोई फैशन-डिजाइनिंग कॉम्पिटिशन! विरोध का ऐसा अलौकिक तरीका कि आम जनता भी सोच में पड़ गई है कि भाई, मुद्दा क्या था और ये पहुंचा कहां दिया?

झारखंड के छात्र ‘संघी’ और दिल्ली वाले ‘असली’?

​राजनीतिक निष्पक्षता का आलम यह है कि झारखंड में सड़कों पर उतरे छात्र अचानक ‘ग़ायब’ हो चुके हैं। विपक्ष के चश्मे का नंबर ऐसा सेट है कि दिल्ली का प्रोटेस्ट एकदम ‘प्योर और ऑर्गेनिक’ दिखता है, लेकिन झारखंड का छात्र आंदोलन इन्हें शायद ‘संघी’ या ‘प्रायोजित’ नजर आता है। आंदोलन की आग झारखंड में धधक रही है, और हमारे नेताजी इलाहाबाद में बैठकर बिहार के छात्रों की तकलीफें सुनने का नाटक फरमा रहे हैं। वाह! क्या टाइमिंग है और क्या जियोग्राफी का ज्ञान है!

डीपी बदली, पर ‘बंदर छाप’ सोच का क्या?

​झटपटाहट का स्तर ऐसा है कि विरोध करने के चक्कर में तीर खुद इन्हीं की छाती में आ लग रहा है। अभी कल ही की तो बात है, आम आदमी पार्टी ने प्रधानमंत्री को ’56 इंच का छोटा बंदर’ बताते हुए पूरे लाव-लश्कर के साथ सोशल मीडिया की डीपी (DP) बदली थी। पर जनता ने ऐसा लालत-मनात का फीडबैक दिया कि 24 घंटे के भीतर वो सारे बंदर वाले अवतार चुपचाप हटा लेने पड़े। अब समझ नहीं आ रहा कि यह विरोध का नया स्तर है या अपनी ही फजीहत कराने की कोई नई ‘ऑर्गेनिक’ तकनीक?

मुफ्त की सलाह: ‘बकलोली’ जारी रहनी चाहिए!

​पहले तो राजनीतिक विश्लेषक और शुभचिंतक राहुल जी को यह मुफ़्त सलाह दिया करते थे कि—”सर, बस छह महीने शांत बैठ जाइए, चुनाव में फाइटिंग लेवल पर आ जाएंगे।” लेकिन संसद का यह नया ‘मोदियाबिंद अवतार’ देखने के बाद अब यह सलाह भाजपा के लिए बनती है! भाजपा को चाहिए कि विपक्ष को संसद में ऐसी ‘रचनात्मक बकलोलियां’ करने का पूरा मौका दे। जितनी बार ये ऐसे ‘थंडर आइडियाज’ लाएंगे, जनता की नजरों में इनका ग्राफ उतना ही नीचे गिरता जाएगा।

​अगर कांग्रेस का ‘मोदियाबिंद का चश्मा’ ऐसे ही बरकरार रहा और झारखंड के छात्रों की वास्तविक तकलीफें यूं ही नज़रअंदाज़ होती रहीं, तो सपा (सपा) के रहम-ओ-करम पर मिलने वाली दो-चार सीटों के भी लाले पड़ना तय हैं।

राजनीति में विरोध होना चाहिए, पर विरोध जब विचार से उतरकर ‘मोदियाबिंद’ के फोबिया में बदल जाए, तो फिर संसद में नीतियां नहीं, सिर्फ फैशन शो ही देखने को मिलते हैं!

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