Priyanka Gandhi : पेपर लीक विरोधी बिल पर लोकसभा में बहस तो परीक्षा तंत्र को सुधारने के लिए शुरू हुई थी, लेकिन बात ‘अकादमिक गरिमा’ और ‘राजनीतिक बयानबाज़ी’ की जंग तक जा पहुंची। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा द्वारा IIT मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामकोटि पर की गई एक टिप्पणी के बाद, देशभर के 215 वर्तमान व पूर्व कुलपतियों (VCs) और नामी शिक्षाविदों ने मोर्चा खोल दिया है।
तमाम शिक्षाविदों ने प्रियंका गांधी को एक खुला पत्र (Open Letter) लिखकर सार्वजनिक विमर्श और वैज्ञानिक सोच के गिरते स्तर पर गहरी चिंता जताई है।
आखिर क्या था वो बयान, जिस पर हुआ बवाल?
28 जुलाई को लोकसभा में एंटी-पेपर लीक बिल पर चर्चा के दौरान प्रियंका गांधी ने केंद्र सरकार पर हमला बोलते हुए कहा था….
”प्रधानमंत्री मोदी को अपने सलाहकार बदलने चाहिए। नई-नई कमेटियां बनाने से कुछ नहीं होगा। अभी बनी नई कमेटी में तो एक ‘गोमूत्र विशेषज्ञ’ भी शामिल हैं! इन्हें भला हमारी शिक्षा व्यवस्था के बारे में क्या पता होगा?”
विवाद का बैकग्राउंड
दरअसल, प्रो. कामकोटि का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने पारंपरिक ज्ञान का हवाला देते हुए दावा किया था कि गोमूत्र में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण होते हैं, जो कई बीमारियों में कारगर हैं। जब इस पर आलोचना हुई, तो प्रो. कामकोटि ने स्पष्ट किया था कि इसके वैज्ञानिक प्रमाण अंतरराष्ट्रीय रिसर्च जनरल्स में भी प्रकाशित हो चुके हैं और इसे बिना समझे खारिज करना गलत है।
खुले पत्र में क्या बोले 215 शिक्षाविद?
देश के शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों के प्रमुखों ने प्रियंका गांधी की ‘गोमूत्र विशेषज्ञ’ वाली टिप्पणी पर कड़ा ऐतराज जताया। पत्र के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं….
‘व्यक्ति नहीं, विचार को चुनौती दें’
शिक्षाविदों ने कहा कि संसद विचारों के मंथन का मंच है। अगर आपको किसी वैज्ञानिक के विचारों या दावों से असहमति है, तो उनके साक्ष्यों (Evidence) को चुनौती दीजिए, तर्कों पर बहस कीजिए; लेकिन विद्वान को निजी तौर पर नीचा दिखाना गलत है।
वैज्ञानिक सोच को झटका
किसी भी स्कॉलर को केवल एक लेबल लगाकर खारिज कर देना उस वैज्ञानिक सोच (Scientific Temper) को कमजोर करता है, जिसे हमारा संविधान बढ़ावा देने की बात कहता है।
शोध समुदाय में गलत संदेश
इस तरह की राजनीतिक बयानबाजी से देश के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं में यह डर बैठता है कि सार्वजनिक बहस में भाग लेने पर उनका उपहास उड़ाया जाएगा।
कौन हैं प्रोफेसर वी. कामकोटि?
शिक्षाविदों ने पत्र में प्रो. कामकोटि की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए प्रियंका गांधी को याद दिलाया कि वे देश के सबसे प्रमुख तकनीकी दिमागों में से एक हैं…

शिक्षाविदों की अपील
पत्र के समापन में शिक्षाविदों ने कहा कि “उपहास कभी भी तर्कसंगत बहस का विकल्प नहीं हो सकता।” जनप्रतिनिधियों के बयानों का समाज पर गहरा असर पड़ता है। जब जटिल वैज्ञानिक मुद्दे राजनीतिक तंज की भेंट चढ़ जाते हैं, तो देश एक स्वस्थ और जागरूक बहस का अवसर खो देता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में संसद के भीतर विमर्श का स्तर गरिमापूर्ण रहेगा।