Mohammed Rafi: मोहम्मद रफी की आज (24 दिसंबर, 2024) को 100वीं जयंती है। इस खास मौके पर हम उनके जीवन से जुड़ा दो खास किस्सा साझा कर रहे हैं। मोहम्मद रफी जैसी अद्भुत प्रतिभा संगीत की दुनिया में बहुत कम ही देखने को मिलती है। महानगरी में कई गायक आए और गए, लेकिन रफी साहब की आवाज और उनका संगीत अब तक जिंदा है और सदियों तक ऐसे ही रहेगा।
जब जवाहरलाल नेहरू ने मोहम्मद रफी को बुलाया घर
रफी साहब से जुड़ी कई दिलचस्प कहानियां हैं, लेकिन भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से जुड़े दो किस्से ऐसे हैं, जिसे कम ही लोग जानते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि साल 1948 में रफी साहब का गाना इतना ज्यादा लोकप्रिय हुआ था कि इसे सुनने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री ने रफी साहब को अपने घर पर बुला लिया था। यह गाना ‘सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों बापूजी की अमर कहानी’ था, जो बेहद लोकप्रिय हुआ। इसे राजेंद्र कृष्णा ने लिखा था। यह गाना इतना ज्यादा लोकप्रिय हुआ कि उन्हें प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के घर में इसे गाने का मौका मिला था।
यह भी है दिलचस्प किस्सा
इसके अलावा जवाहर लाल नेहरू से जुड़ा एक और किस्सा काफी मशहूर है। एक बार जब मोहम्मद रफी ने ‘दोस्ती’ फिल्म का मशहूर गाना ‘चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे’ एक इवेंट में गाया था तब इस कार्यक्रम में पंडित जवाहरलाल नेहरू भी उपस्थित थे। गाना सुनते हुए पंडित नेहरू अपनी भावनाओं को काबू नहीं रख सके और उनकी आंखों में आंसू आ गए थे।
कई संगीतकारों के साथ किया काम
रफी साहब का करियर कई महान संगीतकारों के साथ जुड़ा रहा। उन्होंने नौशाद, एसडी बर्मन, शंकर-जयकिशन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, ओपी नैय्यर और कल्याणजी-आनंदजी जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ कई शानदार गीत गाए।
मोहम्मद रफी का ये गाना सुन जवाहरलाल नेहरू ने बुला लिया था घर
‘ओ दूर के मुसाफिर…हमको भी साथ ले ले…हम रह गए अकेले’ ‘ट्रेजडी किंग’ दिलीप कुमार अभिनीत फिल्म ‘उड़न खटोला’ (1955) का यह दर्दभरा गाना मोहम्मद रफी की रह-रहकर उनके फैंस को याद दिलाता रहता है। रफी साहब ने हिंदी सिनेमा पर अपनी पार्श्व गायकी से अमिट छाप छोड़ी है।
मोहम्मद रफी साहब का जन्म 24 दिसंबर 1924, को कोटला सुल्तान सिंह, (अमृतसर में एक गांव) पंजाब में हुआ था।
पंजाब में पैदा होने के बाद वह परिवार संग लाहौर (पाकिस्तान) में शिफ्ट हो गए थे. मोहम्मद रफी का निक नेक फीको था।
13 साल की उम्र में रफी साहब ने लाहौर में पहली बार अपनी गायकी का हुनर दिखाया था।
1944 में मोहम्मद रफी ने लाहौर में जीनत बेगम के साथ ड्यूट सॉन्ग ‘सोनिये नी, हीरिये नी’ से अपने गायन की शुरुआत की थी। इसके बाद रफी साहब को ऑल इंडिया रेडियो (लाहौर) ने गाने के लिए आमंत्रित किया था।
मोहम्मद रफी ने 1945 में फिल्म ‘गांव की गोरी’ से हिंदी फिल्मों में डेब्यू किया था।
1948 में महात्मा गांधी की राजनीतिक हत्या पर मोहम्मद रफी ने हुस्नलाल भगतराम और राजेंद्र कृष्णा संग मिलकर रातों-रात गीत ‘सुनो-सुनो ऐ दुनियावालों, बापूजी की अमर कहानी’ तैयार किया था।
रफी साहब का यह गाना सुन तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू बहुत प्रभावित हुए थे और उन्होंने रफी को यह गाना गाने के लिए अपने घर बुला लिया था।
1948 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने रफी को रजत पदक से सम्मानित किया था।
1967 में भारत सरकार ने मोहम्मद रफी को पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया था।
मोहम्मद रफी ने अपने गायकी के करियर में चार हजार से ज्यादा हिंदी, क्षेत्रीय भाषाओं में 100 से ज्यादा और पर्सनल 300 से ज्यादा गाने गाए थे।
मोहम्मद रफी ने कई भाषाओं में गाने गाए, जिसमें असमिया, कोंकणी, भोजपुरी, अंग्रेजी, फारसी, डच, स्पेनिश, तेलुगु, मैथिली, उर्दू, गुजराती, पंजाबी, मराठी, बंगाली आदि शामिल हैं।
मोहम्मद रफी साहब को लगभग छह फिल्मफेयर पुरस्कार और एक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाजा गया था।
रफी साहब 31 जुलाई 1980 को महज 56 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए थे।
ऑल इंडिया रेडियो पर जब उनके निधन की खबर दी गई तो, देश को बड़ा धक्का लगा था. रफी साहब के जनाजे में दस हजार से अधिक लोग शामिल हुए थे।
जुलाई 2011 में उनकी पुण्यतिथि मनाने के लिए नौ हजार से अधिक संगीतमय श्रद्धांजलि का आयोजन किया गया था।
रफी साहब के सदाबहार गीत
ओ दुनिया के रखवाले, ये है बाम्बे मेरी जान, सर जो तेरा चकराए, हम किसी से कम नहीं, चाहे मुझे कोई जंगली कहे, मै जट यमला पगला, चढ़ती जवानी मेरी, हम काले हुए तो क्या हुआ दिलवाले हैं, ये हैं इश्क-इश्क, परदा है परदा, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों (देशभक्ति गीत), नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है, चक्के पे चक्का (बच्चों का गीत), ये देश हैं वीर जवानो का, मन तड़पत हरी दर्शन को आज (शास्त्रीय संगीत), सावन आए या ना आए।